रिअलिटी ऑफ़ इंनर लाइफ!

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आज मेरा मन फिर कुछ नया लिखने को कह रहा है लेकिन आज मैं जो कुछ भी लिखने वाली हूँ वो मेरी कल्पना नहीं हैं और न ही किसी कहानी का हिस्सा,यह एक ऐसी हक़ीक़त हैं जिसे हम में से कुछ लोग तो जानते भी होंगे और शायद सुना भी होगा,एक ऐसा ही वाक्या हैं जिसे मैं आप सब क साथ शेयर करना चाहती हूँ|

दसवीं कक्षा के एक्साम्स शुरू होने वाले थे उससे लगभग पंद्रह दिन पहले ही मेरी एक दोस्त ने ब्लाइंड स्टूडेंट्स के राइटर्स बनने के लिए कहा,मेरे लिए यह बात बिलकुल नयी थी,मैंने सुनते ही कहा – “क्या…,ब्लाइंड बच्चो के राइटर्स,उनको पढ़ने की क्या ज़रूरत है,आई मीन वो पढ़ कर क्या करेंगे”

उसने बहुत सरलता से ज़वाब दिया – तुमने ब्रेल लिपि के बारे में नहीं सुना क्या,ब्लाइंड बच्चे भी पढ़ते हैं और …..

-हाँ,बट मुझे वो लैंगुएज थोड़ी आती हैं उससे तो बस प्राइमरी एजुकेशन ही होती होगी,टैंथ क्लास तक ब्रेल लिपि से पढ़ना कितना मुश्किल होता होगा…..

-नहीं,सेकंडरी एंड हाईयर स्टडी के लिए उनको ऑडियो क्लिप मिलती हैं और वो बस सुनते हैं,उनको हमारी लैंगुएज लिखनी नहीं आती इसलिए गोवेरमेंट उनको राइटर्स प्रोवाइड कराती हैं,तुमने देखे होंगे जब हमने टेंथ या ट्वेल्थ का एग्जाम दिया था तब सीबीएसई की आंसर शीट पर राइटर के ऑप्शन थे कि राइटर प्रोवाइड किया हैं या नहीं तो हम नो पर टिक लगाते थे लेकिन ब्लाइंड बच्चो के लिए राइटर्स मैंडेटरी हैं उनके लिए गवर्नमेंट राइटर्स को पे करती हैं ,वो हमारी लैंगुएज नहीं लिख सकते इसलिए,तो बताओ तुम बनना चाहोगी,मेरे कैंडिडेट का दोस्त हैं उसे राइटर की ज़रूरत हैं?

-“ओके,बट तुम्हे इनसब के बारे में कैसे पता?”

-“जब मैं फर्स्ट ईयर में थी तब मैंने अपने कॉलेज में इसका पोस्टर देखा था,और उस टाइम एक प्रोफ़ेसर भी आये थे और उन्होंने कुछ देर तक तो इन पर लैक्चर भी दिया था,हमारे कॉलेज के नियर ही इनका स्कूल हैं बट दिल्ली में अलग अलग स्टेट्स के ब्लाइंड बच्चे हर साल एक्साम्स देने आते हैं,इन बच्चो को अपनी तरफ़ से राइटर्स बुलाने पर बहुत पैसे खर्च करने पड़ते हैं,जल्दी कोई मिलता नहीं है इनको राइटर्स”

-“ऐसा क्यू,इसके लिए गवर्नमेंट तो पे करती हैं न फिर ये बच्चो को भी पे करना पड़ता हैं……”

-“अरे जल्दी कोई राइटर्स बनने को तैयार नहीं होता है इसलिए इन्हे भी कुछ पैसे देने पड़ते हैं”

-ओह,अच्छा ये बताओ फिर उसके बाद इनकी डिग्रियों का क्या होता हैं?,आई मीन पढ़ने के बाद क्या करते हैं इनको जॉब मिल जाती हैं ईज़िली?”

-“हाँ थोड़ा मुश्किल से,गोरनमेंट सेक्टर में तो इनके लिए कुछ सीटे भी रिज़र्व होती एंड तुम्हे पता हैं मेरे स्कूल में म्यूजिक टीचर ब्लाइंड थीं,

इनको तो कॉल सेंटर्स में भी कालिंग की जॉब मिल जाती हैं”

-“गवर्नमेंट सेक्टर में सीट्स रिज़र्व हैं इसके तो इनको तो एक्साम्स क्लियर करने पड़ते होंगे,आई थिंक आसान तो नहीं होता होगा ”

हाँ,इन्हे एक अच्छा राइटर्स मिलना बहुत मुशिकल होता हैं जो गवर्नमेंट एक्साम्स क्लियर कर सके,इसके लिए उन्हें बहुत पैसे खर्च करने पड़ते है और ये लोग करते भी हैं”

-“ओह,बट मैंने तो तीन चार साल पहले टेंथ का एग्जाम दिया था इतनी जल्दी इतने सारे सेलेबस कैसे रिकवर हो पायेगा”

-डोंट वॉरय,इनकी चेकिंग बहुत लिनिएंट होती है एंड वो बच्चे भी थोड़ी बहुत तैयारी करके आते हैं तो हो जाता हैं ईज़िली,

-“ओके,तुम मुझे अड्रेस और एक्साम्स डेट शीट सेंड कर देना मेरे व्हाट्सअप नंबर पर”

-“ओके”

“पंद्रह दिन बाद”

दसवीं का पहला पेपर हिंदी का हैं,थोड़ा डर लग रहा था लेकिन हर स्टूडेंट की तरह मेरा भी यही मानना हैं कि हिंदी का पेपर तो इजी होता हैं ,हो जायेगा…

थोड़ी बहुत नेट से ही रिवाईस किया था लेकिन ये मेरे जीवन का पहला अनुभव होने वाला था कि मैं किसी दूसरे स्टूडेंट का एग्जाम देने वाली हूँ ख़ैर जब हम स्कूल पहुंचे तो स्कूल के गेट पर पहले से ही लोगो की भीड़ थी,ब्लाइंड स्टूडेंट्स के राइटर्स खड़े थे और एंट्री होने का वेट कर रहे थे उन स्टूडेंट्स को पहले ही एंट्री मिल चुकी थी हमें भी ज़्यादा देर वेट नहीं करना पड़ा कुछ मिनट बाद ही एंट्री होनी शुरू हो गयी थी|

मैंने अभी तक डिसेबल्ड बच्चो को इतने नज़दीक से नहीं देखा था,उस स्कूल में लगभग तीस ब्लाइंड स्टूडेंट्स खड़े थे ज़्यादा तर स्टूडेंट्स पहनावे से गरीब घर के लग रहे थे मैंने जब उनको देखा तो मुझे लग रहा था कि मैं किसी और दुनिया में आ गयी हूँ ,हमारे समाज में इस तरह के लोग भी रहते हैं मैं यही सोच रही थी,मैंने एक स्टूडेंट को बहुत ध्यान से देखा जिसका सिर बहुत बड़ा था और फोरहैड आगे के साइड कुछ ज़्यादा ही उभरे हुए थे,उसकी आँखों में भी रौशनी नहीं थी ऐसे बहुत सारे लोग थे जिनका ज़िक्र करना मुश्किल हैं,उन ब्लाइंड स्टूडेंट्स के आँखों में रौशनी न होते हुए भी कई सारी प्रोब्लेम्स थी,मेरा मन उनको देखने के बाद बिलकुल निराश हो गया था,मैं एक और ब्लाइंड स्टूडेंट का ज़िक्र करना चाहूंगी जिसका एक पैर नहीं था उसके लिए उसकी ज़िंदगी कितनी मुश्किल होगी,ना उसके आँखों में रौशनी थी और न ही एक पैर मैं बार-बार यही सोच रही थी के ये लोग सर्वाइव कैसे करते होंगे,हमारे शरीर के सिक्स सेंस में से अगर एक भी काम न करे तो कितना मुश्किल होता हैं लेकिन इनको तो कई अन्य प्रोब्लेम्स भी हैं,मेरे मन में काफी सारे सवाल थे मैंने अपनी फ्रेंड से कहा,ये लोग कैसे रहते होंगे,कितनी प्रोब्लेम्स होती होगी इनको,मेरा मन कर रहा हैं मैं यहाँ से चली जाऊं,उसने मुझे समझाया कि यह तो ऊपर वाले की देन हैं इसमें ये बिचारे लोग क्या कर सकते हैं,ये लोग कैसे जीते हैं,रहते हैं यह तो सिर्फ यही लोग बता सकते हैं पता हैं शुरू में मेरे साथ भी ऐसा ही हुआ था लेकिन धीरे -धीरे आदत हो गयी इनको देखने की……,

मेरे लिए ये बहुत बड़ा आश्वासन था,मैंने फिर सोचा अगर चली गयी तो मेरा जो कैंडिडेट हैं उसका यह साल बेकार हो जायेगा अगर उसे राइटर नहीं मिले तो और अब तो एक्साम्स भी शुरू होने वाले हैं……

मेरा सवाल अब उस ऊपर वाले से था कि उन्होंने ब्लाइंड लोगो को क्यूँ बनाया,इस दुनिया में आम इंसान को जीना इतना मुश्किल होता हैं और यह तो खैर ब्लाइंड लोग हैं जिनका सवेरा ही अँधेरे में होता हैं |

एग्जाम रूम नंबर देखने के बाद हम सब क्लास में चले गए,इत्तेफाक कह सकते हैं मेरी फ्रेंड का मेरे से आगे वाले डेक्स पर था रोल नंबर,मुझे थोड़ा अच्छा लगा,मेरा जो कैंडिडेट था वो बहुत छोटे कद का था,उसका सिर उसके चेहरे के हिसाब से काफी बड़ा था उसकी सफ़ेद दांते बाहर निकली हुई थी,उसके आँखों पर मेरी नज़र गयी उसके आँखों के ब्लैक सर्कल नहीं थी,वो एक्साम्स को लेकर काफी टेंशन में था,एग्जामिनर ने पहले ही अनाउंस कर दिया था की सिर्फ अपने कैंडिडेट से आपस में आंसर डिस्कस कर सकते हैं लेकिन राइटर्स आपस में बात नहीं करेंगे…..

प्रश्नोत्तर मिलने से पहले मैंने थोड़ा हिम्मत करके पूछा-“आपने कुछ याद किया हैं”

वो बिलकुल चौक गया,और बहुत ही हड़बड़ाहट में जवाब दिया कि बीमार होने की वजह से उसे अपने घर जाना पड़ा था जिसकी वजह से उसने कुछ नहीं पढ़ा,मैं ये समझ गयी थी के सारा पेपर मुझे की करना पड़ेगा,पेपर करने के लिए ब्लाइंड स्टूडेंट्स को चार घंटे मिलते हैं यानी के एक घंटा एक्स्ट्रा !

आंसर शीट मिलने के बाद मैंने लिखना शुरू कर दिया,थोड़ी ही देर बाद राउंड पर एक सर आये और उन्होंने अनाउंस किया कि सारे राइटर्स अपने कैंडिडेट से आंसर डिसकस करने के बाद ही लिखेंगे,जैसा की मुझे पता था सारा पेपर मुझे ही करना था इसलिए मैंने अपने कैंडिडेट से पूछा:-

-आप को यहा तक छोड़ने कौन आता हैं?

(पहले तो वह बिलकुल शांत रह कर सुनता रहा फिर उसने कहा)-“कोई नहीं, हम खुद आते हैं”

उसकी बाते सुन कर मैं हैरान थी,और मेरे लिए उसकी बातो पर विश्वाश करना मुश्किल था

-आप वैसे कहाँ से आते हो?

-“मैं नॉएडा के हॉस्टल में रहता हूँ वहां सिर्फ ब्लाइंड बच्चे ही रहते हैं लेकिन मेरा घर कानपुर के साइड हैं,मैं और मेरा दोस्त दोनों एक साथ आते हैं”

-अच्छा…,आप यहाँ तक कैसे आये,मतलब आपको हॉस्टल की गाड़ी वगैरह छोड़ने आती होंगी?

-“नहीं,मेरा और मेरे दोस्त का मैट्रो का पास बना हैं हम दोनों पहले मेट्रो में आते हैं फिर बस से यहाँ तक आते हैं”

मेरे मन में फिर से एक सवाल था,सोच रही थी पुछु या न पुछु,फिर मैंने सोचा अगर पूछूँगी नहीं तो मेरा सवाल रह जायेगा

-आप लोगो को आने में कोई परेशानी होती हैं?,मतलब…….

(वो मेरी बात सुन कर बिना हसीं के हसने लगा,मुझे अब अपने सवाल से नफरत होने लगा था ये तो कॉमन सी बात थी मुझे नहीं पूछनी चाहिए था,थोड़ी देर में पुरे क्लास के लोग शांत होकर पेपर करने लगे,बस कुछ लोगो की बाते करने की आवाज़ आ रही थी,अब मेरे कैंडिडेट ने मुझसे पूछना शुरू कर दिया -सिस्टर आप तो यही दिल्ली में रहती होंगी?

मैंने कहा-“हाँ,और ये स्कूल भी मेरे घर से ज़्यादा दूर नहीं हैं”

-“आप क्या करती हैं मेरे ख्याल से पढाई करती होंगी”

-“हाँ जी,अभी तो मैं भी पढाई करती हूँ लेकिन साथ में थोड़ी बहुत कहानियाँ भी लिख लेती हूँ”

-अच्छा आप कहानिया लिखती हैं,कैसी कहानिया लिखती हैं?

-“कुछ ख़ास नहीं बस जो कल्पना कर पाती हूँ वही लिखती हूँ,मेरी स्टोरीज सारी काल्पनिक होती हैं”

-“आप कभी हम जैसे ब्लाइंड लोगो पर भी कुछ लिखना,वैसे आप यहाँ आयी हो तो बहुत कुछ देखी होंगी……”

-हाँ ये मेरे लाइफ का पहला अनुभव होगा,और मैं इस पर ज़रूर लिखूंगी

(उसने बहुत जल्दी जबाब दिया)

-“ठीक हैं आप लिखना मैं ज़रूर पढूंगा”

(उसका कॉन्फिडेंस देख कर लग रहा था के अगर वो देख पाता तो मेरी सारी स्टोरीज़ पढ़ता)

मैंने अपना पेपर तीन घंटे में ही कर लिया था और जब मैंने अपनी फ्रेंड से पूछा तो उसने दस मिनट वेट करने को कहां)

मैं अपने जगह पर ही बैठी थी,मेरा कैंडिडेट भी वही था,उसने मुझसे कहा-

सिस्टर आप मुझे बता सकती हैं की क्या-क्या प्रशन आये हैं

मैंने कहा – बिलकुल,मैं पढ़ कर बताती हूँ”

(उसने सारे क़्वेश्चन बहुत ध्यान से सुना,थोड़ी देर बाद मेरी फ्रेंड ने भी अपना पेपर कर लिया और हम जाने के लिए तैयार हो गए,मैंने अपनी फ्रेंड से कहा कि सारा पेपर मैंने ही किया हैं मेरे कैंडिडेट ने कुछ भी याद नहीं किया था,उसने मुझे समझाया अगर ऐसा हैं तो उतना ही लिखना जितने में पास हो जाये नहीं तो ज़्यादा मार्क्स आगये तो इनका टेस्ट लेने लग जायेंगे,फिर उसके लिए प्रॉब्लम हो जाएगी,ऐसे ही बाते करते-करते हम दोनों एग्जिट गेट के पास पहुंच गए,
,वहां पर काफी सारे स्टूडेंट्स और उसके राइटर्स आपस में पैसो को लेकर बाते कर रहे थे,वहां पर सबसे अजीब ये था कि कुछ राइटर्स पैसो को लेकर अपने कैंडिडेट से झगड़ भी रहे थे,मैंने जब अपनी फ्रेंड्स से पूछा तो उसने कहा,पैसे कम दिया होगा इसलिए लड़ रहे हैं,मैंने अपनी फ्रेंड से फिर पूछा – ये लोग पैसे कहाँ से लाते हैं,मतलब देने के लिए……
– जो लोग मन्नते मांगते हैं या फिर इनसे मिलने जाते हैं वो इनको पैसे देते हैं और गॉवमेंट कि तरफ से भी मिलते हैं पैसे,कुछ के तो पेरेंट्स आकर पैसे भी ले जाते हैं इनसे,
-क्या….,पैरेंट ले जाते हैं पैसे…..,,,
हमारी आवाज़ सुन कर हमारे कैंडिडेट्स भी वहां आ गए
-मेरी फ्रैंड उससे एग्जाम के बारे में पूछने लगी,थोड़ी देर में हम दोनों के कैंडिडेट पैसे गिन कर देने लगे,जैसे ही मेरे कैंडिडेट ने पैसे देने के लिए हाथ बढ़ाया, मैंने उसे मना कर दिया -ये पैसे आप रख लो,मुझे नहीं चाहिए….
-सिस्टर आप ने मेरा पेपर किया हैं उसके लिए हैं ये….
-“मैंने पेपर किया हैं तो उसके लिए हमें एग्जामिनर देते हैं पैसे,आप मत दो……
उसने फिर भी पैसे देने के लिए ज़िद किया मैंने कहा-सिस्टर भी कहते हो और पैसे भी दे रहे हो,क्या एक बहन अपने भाई के लिए इतना भी नहीं कर सकती क्या,ये पैसे आप रख लो और बाहर कुछ खरीद कर खा लेना,ठीक हैं!”
(इस बार वह मेरी बात मान गया और पैसे वापस जेब में डाल लिया )
उसके बाद मैं और मेरी फ्रेंड दोनों वापस घर आ गए,मैंने अपने घर में सभी को उन ब्लाइंड स्टूडेंट्स के बारे में बताया,शायद मेरे घर में भी ज़्यादा किसी को पता नहीं था और कुछ तो अफ़सोस भी कर रहे थे कि लोग ऐसा करते है पैसो के लिए,मेरी अम्मी ने मुझे बताया कि उन लोगो को हमारे मदद कि ज़रूरत होती हैं जहाँ तक हमें हेल्प करनी चाहिए तो लोग उल्टा उनसे ही पैसे लेते हैं,खैर अगला पेपर इंग्लिश का था,जो दो दिन बाद होना था इसके लिए भी मैंने थोड़ा बहुत इंटरनेट से पढ़ लिया था|

दो दिन बाद

मैं और मेरी फ्रेंड दोनों फिर उस स्कूल में एग्जाम देने गए इस बार सब ठीक था पहले दिन की तरह मुझे आज बिलकुल नहीं लग रहा था,हम दोनों एग्जाम रूम देखने के बाद अपने-अपने क्लास में चले गए इस बार मेरी फ्रेंड का रोल नंबर दूसरे क्लास रूम में था,आज बिलकुल टाइम पर हम पहुंचे थे सीट पर बैठते ही क्वेश्चन पेपर मिलना शुरू हो गया था,थोड़ी देर बाद आंसर शीट भी मिल गयी मैंने लिखना शुरू कर दिया था,फिर से राउंड पर वही सर आये और उन्होंने वही बाते कही के आंसर अपने कैंडिडेट से डिसकस करने के बाद ही लिखना हैं,इस बार मेरे कैंडिडेट ने मुझसे सवाल किया:-

-“सिस्टर आज कल आप कौन सी कहानी लिख रही हैं ?”

-“अभी तो नहीं लिख रही क्यूंकि मेरे भी एक्साम्स शुरू होने वाले हैं इस मंथ के लास्ट में,उसके बाद से लिखुंगीं”

-“आप कहानी लिखने के बाद उसका क्या करती हो?”

-“फिर मैं पब्लिश करती हूँ वैसे अभी तक तो सिर्फ खुद से ही फ़्री वेबसाइट पर पब्लिश किया हैं लेकिन जल्द ही किसी पब्लिशर से पब्लिश करवाउंगी”

-“आप अपनी कहानी ब्रेल लिपि में भी पब्लिश करवाना,हम भी पढ़ेंगे आप की स्टोरीज,मैंने अपने हॉस्टल के दोस्तों को बताया तो वो भी आप की कहानिया पढ़ना चाहते है,आप ने यूट्यूब पर डाला हैं””

-अच्छा…,नहीं यूट्यूब पर तो नहीं डाला हैं अभी ……..

-दिल्ली में कहीं पर उत्तम नगर हैं,वहां पर ब्रेल लिपि में कहानी पब्लिश करते हैं…..

-“हाँ ज़रूर करवाउंगी ब्रेल लिपि में भी पब्लिश”,

उसके बाद मैं शांत होकर लिखने लगी

थोड़ी देर बाद मेरे कैंडिडेट ने फिर से मुझसे सवाल किये,इस बार उसने किसी लड़की का नाम बताया और पूछा की आप जानती हो इसे,ये भी मुस्लिम ही हैं और ये भी आप की तरह कहानियां लिखती हैं काफी फेमस भी हैं,मैंने तो पहली बार इस लड़की का नाम सुना था इसलिए मेरा ज़वाब था नहीं,

मैंने पूछा -आप को कैसे पता चला इसके बारे में

-“मैंने रेडियो पर सुना था,उसी पर सुन कर पता चलता हैं”

मैं फिर से शांत होकर लिखने लगी,इस पेपर को भी मैंने तीन घंटे में कर लिया था,लिखने के बाद हम जा सकते थे,मेरी फ्रेंड भी गेट के पास खड़ी थी,हम दोनों फिर से बाते करते करते एग्जिट गेट के पास पहुंचे,वहां पर हम दोनों के कैंडिडेट खड़े होकर बाते कर रहे थे,किसी कुत्ते के काटने की बात कर रहे थे

हमने पूछा – किसे कुत्ते ने काट लिया?

मेरी फ्रेंड के कैंडिडेट ने कहा-परसो हम लोग जा रहे थे यहाँ से तो छोटू ने एक कुत्ते के ऊपर पैर रख दिया था तो उस कुत्ते ने इसके पैर में काट लिया हैं |

हम दोनों ने हमदर्दी जताते हुए कहा – तो डॉक्टर को क्यूँ नहीं दिखाया,अभी तो ज़्यादा टाइम नहीं हुआ है यहाँ से जाते ही डॉक्टर को दिखा लेना नहीं तो ज़हर फैल जायेगा तो बाद में बहुत प्रॉब्लम आएगी ।

उन दोनों ने अपना-अपना एक्सपेरिएंस बताया – एक बार जब हमें सांप ने काटा था तो दो दिन तक तो दर्द हुआ लेकिन फिर अपने आप ही ठीक हो गया,हम पर कोई ज़हर काम नहीं करता यह भी अपने आप ठीक हो जायेगा।

उनकी बाते सुन कर हमारे चेहरे की स्माइल चली गयी थी,मैंने पूछा-“आप लोग लोग अपने हॉस्टल के टीचर या फिर देखरेख करने वाले को नहीं बताते…..”

-वो दोनों बिना हसी के हसने लगे थे उनकी हसी से लग रहा था कि इनकी समस्याओ पर कोई ध्यान नहीं देता होगा ।

हम दोनों वापस अपने- अपने घर आ गए,अगला पेपर था म्यूजिक का हालांकि मैंने कभी म्यूजिक के बारे में पढ़ा नहीं था लेकिन एग्जाम देने थे इसलिए मैंने उसकी भी थोड़ी बहुत तैयारी की थी,ये पेपर भी अच्छे से हो गया था इससे अगला पेपर था संस्कृत का जो मुझे कभी समझ आया ही नहीं हालांकि मैंने तीन साल तक पढ़े थे लेकिन मैं उसमे पास कैसे हो गयी थी यह मुझे भी नहीं पता चला अभी तक,इस बार मेरा पेपर नहीं था इसलिए मैंने अपनी फ्रेंड को बताया कि मुझे संस्कृत लैंग्वेज नहीं आती हैं और मैं इस बार कोई रिस्क नहीं लेना चाहती क्यूँकि अगर ये स्टूडेंट रह गया तो इनका कम्पार्टमेंट आ जायेगा,उसने हसते हुए कहा-मुझे कौन सी आती हैं,अरे इतना मुश्किल नहीं होता हैं,आस पास वाले हेल्प कर देते हैं………….

मैंने फिर भी सोचा कि अपने जान पहचान के लोगो से बात करती हूँ शायद वो मुझसे अच्छा करेंगे,मुझे उस दिन ये अहसास हुआ कि सच में इन ब्लाइंड स्टूडेंट्स को राइटर ढूंढने में मुश्किल होता होगा…..,

ये पेपर भी मुझे ही करना था,मैं अपनी फ्रेंड से पूछती रही कि वो संस्कृत का पेपर कैसे करती हैं,उसने भी स्कूल टाइम में संस्कृत लैंग्वेज नहीं पढ़ा था बल्कि उसके पास तो पंजाबी लैंग्वेज थी खैर मैंने ये पेपर भी अच्छे से कर लिया और मेरे साथ वाले लोगो ने काफी हेल्प किया था,इससे अगला पेपर था सोशल स्टडी का जो मेरा कभी फेवरेट सब्जेक्ट हुआ करता था,इसे भी मैंने अच्छे से कर लिया था लेकिन मुझे अपनी फ्रेंड कि कही हुई बाते याद थी के अगर इनके ज़्यादा मार्क्स आ गए तो उनका टेस्ट लिया जायेगा इसलिए मैंने उतना ही लिखा जितने से यह पास हो सके ।

लगभग डेढ़ महीने बाद रिजल्ट आया,जिसमे उस स्टूडेंट के सिक्सटी वन पर्सेंट मार्क्स थे उसने मुझे फ़ोन करके बहुत ख़ुशी-ख़ुशी

बताया –“सिस्टर मेरा सिक्सटी वन पर्सेंट मार्क्स आया हैं और आप डर रहे थे संस्कृत में उसमे तो सिक्सटी सेवन पर्सेंट मिला हैं,आप का बहुत-बहुत धन्यवाद कि आपने मेरी इतनी मदद कि,मैंने पढ़ा भी नहीं था लेकिन अच्छे नंबर से पास हो गया हूँ दसवीं में…..

आप मेरे बारहवीं का भी पेपर दे देना,ठीक हैं!”

ब्लाइंड स्टूडेंट्स के लिए सिक्सटी वन परसेंट बहुत मायने रखते हैं

-“पहले तो मैंने उसको पास होने के लिए मुबारक बाद दिया,फिर मैंने उसे समझाया कि अगली बार से आप भी अच्छे से तैयारी कर लेना नहीं तो आप को कभी समझ नहीं आएगा कि आप के पास क्या-क्या सब्जेक्ट्स थे ,और अगला पेपर मैं आप का नहीं दे पाऊँगी क्यूंकि मैंने आर्ट्स स्ट्रीम नहीं पढ़ा हैं इसलिए मेरे लिए बहुत ज़्यादा मुश्किल हो जायेगा लेकिन मैं आप के लिए दुआ कर सकती हूँ के आप को एक अच्छा राइटर मिले……”

मुझे बहुत अच्छा लगा कि मेरी थोड़ी सी मेहनत किसी दूसरे कि काम आयी हैं और वो भी ऐसे लोग के जिसे हमसब कि मदद की ज़रूरत रहती हैं,अपने आप में यह बात बहुत गलत हैं कि हम जैसे लोग इन सब के साथ बुरा व्यहवार करते हैं लेकिन सच ये हैं कि हमारी थोड़ी सी मदद से शायद इनकी ज़िन्दगी बदल सकती हैं इसलिए जब भी मौका मिले ऐसे लोगो कि मदद ज़रूर करे वैसे तो हमारे देश कि सरकार डिसएबल लोगो के लिए बहुत कुछ करती हैं लेकिन हमे भी थोड़ा सहयोग करनी चाहिए !

थैंक्स फॉर रीडिंग

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दास्तानें ज़िन्दगी !

आज मैं आप लोगो को एक ऐसे इंसान कि कहानी बताने जा रही हूँ जिसे सुन कर मेरी आँखे भर आयी थी,लेकिन मुझे ख़ुशी भी है क्यूंकि उसने अपनी गरीबी पर विजय पा लिया है , मेरी ये कहानी एक ऐसे लड़के की है जिसने अपने परिवार की मदद करने के लिए खुद के बचपन को कुर्बान कर दिया और बहुत ही कम उम्र में एक सफल इंसान बन गया |
बात लगभग 1990 की है मनोज नाम का एक लड़का जो लगभग पंद्रह साल का रहा होगा ,वह अपने रिश्तेदार के साथ लुधियाना जाने के लिए तैयार हो रहा था (मनोज का जन्म बिहार के एक जिले जो सहरसा नाम से जाना जाता है में हुआ था,वहाँ उसके पुरखो की ज़मीन थी जिसपर उसके परिवार वाले रह रहे थे )
मनोज के घर में पांच बहने और दो छोटे-छोटे भाई थे ,मनोज अपने भाई बहनो में तीसरे नंबर पर था ,उसके माँ बाप अपनी बेटियों की शादी को लेकर बहुत चिंतित थे क्युकि उसके घर में इतनी आमदनी नहीं थी के वह घर चलाने के अलावा कुछ पैसे बचा पाए अपने बेटियों की शादी के लिए ,जब मनोज पंद्रह साल का हुआ तो उसके माँ बाप ने उसे कमाने के लिए शहर भेजने का निर्णय लिया|
उन्होंने इसके लिए अपने सभी रिश्तेदारों से बाते करनी शुरू कर दी,ये वे लोग थे जो शहरो में अपना व्यवसाय चला रहे थे,उनमे से एक रिश्तेदार मनोज को अपने साथ शहर ले जाने के लिए तैयार हो गया वह मनोज को अपने साथ लुधियाना ले कर जा रहा था |
मनोज को उसका रिश्तेदार अगली सुबह ही लेकर जाने को कहता हैं क्यूंकि उसकी टिकट बनी हुई थी ट्रैन की जो कल की ही थी मनोज के माता पिता भी मान गए ,मनोज की माँ उसके रास्ते में खाने के लिए कई तरह की चीज़े बना कर कर देती है ,मनोज और उसका रिश्तेदार सुबह की ट्रेन पकड़ कर लुधियाना के लिए रवाना हो गए ,लगभग अठारह घंटे का सफर तय कर के वह दोनों लुधियाना पहुंचते है ,मनोज का रिश्तेदार उसे लेकर अपने मालिक से मिलवाने चला जाता है | उसका मालिक मनोज को रखने से मना कर देता है क्यूंकि वह उस काम के लिए बहुत छोटा था लेकिन जब उसका रिश्तेदार अपने मालिक के कानो में कुछ कहता है तब वह मान जाता है उसके बाद वो मनोज को वह अपनी फैक्ट्री दिखाने ले जाता हैं जहाँ पर खुद काम करता था,वहां पर बड़ी-बड़ी मशीनों पर लोग गाड़ियों के पार्ट-पुर्जे बना रहे थे,मनोज ये पाता है कि वहाँ पर उसके उम्र का एक भी लड़का नहीं था सिर्फ वही सबसे कम उम्र का था ,मनोज को उसका मालिक एक कमरा देता है रहने के लिए जहाँ पहले से ही पांच लोग रह रहे थे,वहाँ पर रह रहे लोगो के अपने-अपने घरो से खाना आता था इसलिए मनोज का मालिक उसे अपने साथ ले जाता था खाना खिलाने के लिए,उसी दिन रात को मनोज खाने के लिए अपने मालिक के घर जाता हैं ,उसे खाने के लिए बची हुई दो रोटियां और थोड़ी सब्जी दिया गया,मनोज का दो रोटी में पेट नहीं भरता तो वह रोटी मांगने की सोचता है लेकिन वो डर जाता है और सोचता हैं कि कही उसका मालिक उसे काम से ना निकाल दे, खाना खाने के बाद उसका मालिक उसे उसका काम बताने लग जाता है,वह कहता है कि ‘तुम्हे फैक्ट्री का काम सिखने में अभी बहुत समय लगेगा इसलिए तुम तब तक मेरे घर में काम कर लेना और उसके बाद मैं तुम्हे काम सिखाऊंगा |’
दिन दर दिन बीतते चले गए,मनोज सिर्फ अपने मालिक के घर में ही काम कर पाता था,उसे कभी भी फैक्ट्री में लेकर नहीं जाते थे,उसे उसके मालिक ने कभी भी काम नहीं सिखाया और तो और वह जिस उम्मीद से अपने मालिक के घर के सारे काम कर रहा था उसे उसके पैसे भी नहीं मिलते थे क्युकि उसके मेहनत का पैसा उसका रिश्तेदार ले लेता था | जब मनोज अपने मालिक से बोलने जाता कि वह अपने वादे के मुताबिक़ उसे काम सिखाये ,तब उसका मालिक उसे डांट कर भगा देता था |
मनोज को उसका मालिक भर पेट खाना भी नहीं देता था और घर के सारे काम भी करवाता था| एक दिन मनोज अपने रिश्तेदार से बात करने गया,और बोला ‘मुझे मालिक फैक्ट्री का काम नहीं सिखा रहे है बस अपने घर के काम करवाते रहते है,आप उनसे बोलो कि वो मुझे काम सिखाये’ मनोज का रिश्तेदार भी उसे झूट-मूट का दिलाशा देता है और कहता है कि ‘मैं जल्द ही मालिक से बात करूँगा तुम्हे काम सिखाने के लिए,तब तक तुम वही करो जो मालिक कहते है’ मनोज फिर से थोड़ी उम्मीद लेकर काम करने लग गया |
मनोज के माँ-बाप उससे हमेशा बाते करते रहते थे और कहते थे पैसे भेजने के लिए लेकिन मनोज उन्हें सच्चाई नहीं बताता ताकि उसके माँ बाप परेशान ना हो जाये,वह उन्हें कह देता था कि अभी वह काम सीख़ रहा है |
एक दिन मनोज ने ठान लिया कि वह अपने मालिक से साफ़-साफ़ बात करेगा और उससे पूछेगा कि वह उसे काम सिखाएंगे या नहीं |
मनोज जब मालिक से बात करने जाता है तब उसका मालिक उसे डांटने और मारने लगता है,मनोज अपने कमरे में बैठ कर खूब रोता है, उस दिन उसे उसका मालिक खाने के लिए भी नहीं देता है उसी दिन मनोज ने ठान लिया कि वह यहा से भाग जायेगा और किसी दूसरे शहर में काम ढूंढेगा |
अगले दिन 15 अगस्त 1990 को वह उस जगह से भाग गया और जाकर एक बस में बैठ गया जो कि दिल्ली जाने वाली थी,कुछ मिनट बाद बस चलने लगी | लगभग एक घंटे बाद बस का कंडक्टर टिकट चेक करने आता है ,वह मनोज को टिकट दिखाने को कहता है लेकिन उसके पास ना तो कोई टिकट थी और ना ही पैसे थे फिर बस का कंडक्टर उसका कॉलर पकड़ कर उसे बस से उतारने लग जाता है तब एक दूसरा कंडक्टर कहता है कि,’जाने दे आज के दिन तो हमारा देश आज़ाद हुआ था और आज के दिन तो कम से कम मारपीट नहीं करनी चाहिए,जाने दे बच्चा है ये और ये अगली बार बिना पैसे के दिखे तब इसे नहीं छोड़ना”|
लगभग दो घंटे में बस मनोज को दिल्ली के एक बस स्टैंड पर उतार देती है, इस प्रकार वह बिना पैसे के दिल्ली पहुंच गया |
मनोज के लिए दिल्ली के सड़के बिलकुल अनजान थी,उसे पता नहीं था कि वह किधर जाये ?लेकिन फिर भी वह उन सड़को पर आगे बढे जा रहा था उस समय दिल्ली कि जनसँख्या कम थी ज्यादातर जगहों पर जंगल देखने को मिलता था ,मनोज दिल्ली के सुनसान गलियों में भूखे प्यासे चले जा रहा था उसके पास ना तो पैसे थे और ना ही खाने के लिए कुछ भी चीज़ें,मनोज को प्यास के मारे चला नहीं जा रहा था, वह किसी से पानी भी नहीं मांग सकता था क्युकि रोड के किनारे एक भी घर नहीं था सिर्फ गाड़िया चल रही थी आगे बढ़ने पर मनोज को एक गड्ढे में पानी इकट्ठा दिखा वह दौड़ कर उसके पास गया और दोनों हाँथो को अर्ध गोल करके पानी पीने लगा,गड्ढे का पानी गन्दा था लेकिन प्यास बुझाने के लिए काफी था,मनोज पानी पीने के बाद फिर आगे बढ़ने लगा, कुछ जगह पर उसे घनी आबादी मिलती तो कुछ जगह बिलकुल सन्नाटा,एक जगह गुरुद्वारे के पास कुछ खाने कि चीज़े बट रहा था ,मनोज वहाँ पर रुक कर देखने लगा वह यह देखता है कि कोई भी लोग वहाँ से खाने कि चीज़े लेकर जा सकता था ,मनोज तो कल रात से ही भूखा था इसलिए उसने भी वहाँ से खाने कि चीज़े ले लिया,मनोज एक पेड़ के निचे बैठ कर खाने लगा और खाने के बाद वह दुबारा आगे बढ़ने लग गया बिना किसी उम्मीद के वह चले जा रहा था ,देखते ही देखते शाम हो गयी मनोज बहुत थक चूका था उसने कही पर रुकने का सोचा आगे बढ़ने पर उसे एक पार्क दिखा,जहा पर कुछ लड़के और लड़किया घूम रहे थे,मनोज उसी पार्क में जाकर एक बेंच पर सो गया,मनोज पूरी रात उसी पार्क में सोता रहा,अगली सुबह कुछ बच्चे आकर उसे परेशान करने लगे तब उसकी आंखे खुली ,पार्क में एक माली पानी डाल रहा था ,मनोज उससे पानी मांग कर पिने लगा और फिर उस पार्क से निकल कर आगे चलने लगा,मनोज फिर से भूखा प्यासा उन गलियों में चले जा रहा था इस बार उसे कोई भंडारा नहीं दिखा जहाँ से वह कुछ खाने को ले सके,लगभग दोपहर हो चुका था ,मनोज बहुत थक गया था उसके दिमाग में अलग-अलग से ख्याल आने लगा कि आखिर वह कब तक इधर उधर भटकता रहेगा ये सब सोचते सोचते वह एक पेड़ के निचे बैठ गया है,वहा कुछ दूर पर कई सारे लड़के क्रिकेट खेल रहे थे वह उसे देख कर अपने बचपन के दिनों को याद करने लगा,अपने माँ बाप को याद करने लगा कि उन्होंने अभी तक ये उम्मीद लगा रखी होगी कि वह उन्हें पैसे भेजेगा,उतने में ही उसे एक आवाज़ सुनाई देती है जो उसका कभी बेस्ट फ्रेंड रहा करता था,लेकिन कुछ साल पहले ही उसका दोस्त अपने माता पिता के साथ दिल्ली आ गया था ,वह उस आवाज़ को सुनते हुए उन लड़को के बीच चला जाता है,और उसे फिर से एक उम्मीद कि एक किरण दिखाई देने लगती है,यह आवाज़ उसके दोस्त रोहन की थी,रोहन मनोज को देखकर बहुत खुश होता है और वह उसे अपने साथ घर ले जाता है |
रोहन अपने घर में सब को मनोज के बारे में बताता हैं और वो अपनी माँ से कहता हैं कि वो उसे खाने के लिए कुछ दे दें,रोहन की माँ उसे खाने के लिए देती है,उस दिन मनोज अपने गांव से आने के बाद भर पेट खाना खाया था उसका दोस्त उसे अपने कपड़े पहनने के लिए देता है और पूछने लगता है कि वह यहाँ तक कैसे पंहुचा,मनोज उसे अपनी सारी बाते बताता है|
मनोज को रोहन अपने बड़े भाई के पास ले जाता है जो एक बुटीक चलाता था ,’रोहन अपने भाई को कहता है कि वह मनोज को अपने बुटीक में रख ले और कुछ काम सिखा दे’ पहले तो उसका भाई मना कर देता है कि उसे कोई लड़के कि ज़रूरत नहीं है लेकिन रोहन के ज़िद करने पर वह उसे एक ऐसे बुटीक में ले जाते है जहाँ पर उसने खुद काम सीखा था,मनोज को उस बुटीक का मालिक रख लेता है और ये वादा करता है कि वह उसे भी बुटीक का सारा काम सिखा देगा|
मनोज को उसका नया मालिक खाना खिलाने के बाद भी पांच सो रूपए का महीना देता था,मनोज लगभग पांच महीने में सारा काम सीख जाता हैं काम सीख लेने के बाद उसकी तन्खा भी बढ़ गयी थी ,अब वह अपने गांव भी कुछ पैसे भेज देता था ,सत्रह साल कि उम्र में वह सिलाई का अच्छा कारीगर बन गया और उसे अच्छी तनख्वा भी मिलने लगी |
वह अपने पैसे जमा करने लग गया और अपने मालिक की मदद से खुद का बुटीक खोल लेता हैं|
वह अपने बुटीक में अपनी सारी मेहनत लगा देता है और दिन रात खूब मेहनत करता हैं और उसकी मेहनत भी खूब रंग लती हैं पांच साल के अंदर में वह वैसी तीन बुटीक का मालिक बन जाता है |
कहते है ना अगर खुद पर भरोसा हो तो इंसान कुछ भी कर सकता है मनोज अपनी कड़ी मेहनत और लगन से एक सफल व्यक्ति बन चुका था,मुझे मनोज जैसे लोगो पर गर्व है अगर उसकी जगह पर कोई और होता तो ज़रूर अब तक भाग चुका होता |

काश वो दिन वापस आ जाते ……….

मेन कैरेक्टर
स्नेहा
राहुल
लीज़ा

स्नेहा – राहुल और मैं बचपन के दोस्त थे,जब मैं छोटी थी तभी से हम दोनों एक दूसरे को जानते थे,राहुल और मेरी दोस्ती इतनी गहरी थी कि मुझे कभी एहसास ही नहीं हुआ उसके प्यार का,वो मुझे हर समय अपने दिल की बात बताने की कोशिश करता रहता था लेकिन मैं “मैं अपने वसूलो पर जीने वाली लड़की थी” कभी उसके बारे में जानने की कोशिश ही नहीं किया,बस एक दोस्त की तरह उस रिश्ते को निभा रही थी जिसने हम दोनों को अभी तक अलग नहीं होने दिया था, मेरा सपना था एक्टर बनना ,मैं ज्यादा अमीर घर से नहीं थी इसलिए मुझे बहुत मेहनत करनी थी अपनी एक पहचान बनाने के लिए,राहुल भी चाहता था एक सफ़ल बिज़नेस मैन बनना वो आसानी से वहा पहुंच सकता था क्यूंकि वो अपने पापा के बिज़नेस को ही आगे ले जाना चाहता था,मुझे एक्टर बनने के लिए बहुत मेहनत करनी पड़ी थी उस बीच राहुल और मैं एक दूसरे के बहुत अच्छे दोस्त बन चुके थे वो मेरी बहुत मदद करता रहता था अब मैं ये जान चुकी थी कि राहुल मुझसे प्यार करता है लेकिन मेरे लिए मेरे सपने उससे ज्यादा महत्वपूर्ण थे,मैं उसकी फिल्लिंग्स को एक दोस्त कि तरह मज़ाक़ में लिया करती थी ताकि मैं उससे प्यार करने न लग जाऊँ,मैं उससे तो क्या किसी भी लड़के से प्यार नहीं करती थी क्यूंकि मुझे लगता था कि कही ये सब मेरे सपने के बीच न आ जाये इसलिए मैं प्यार से डरती थी,हम दोनों के इरादे बहुत नेक थे मैं एक एक्टर बन चुकी थी इसके लिए मुझे मुंबई में ही सेटल्ड होना पड़ा था,राहुल ने भी अपने पापा के बिज़नेस को काफ़ी आगे तक बढ़ा दिया था|

अब मैं उससे काफी दूर जा चुकी थी और कुछ सालों से हमारी बाते भी नहीं हो पा रही थी फिर मुझे राहुल कि कमी लगने लगी,उस दिन मुझे ये अहसास हुआ कि मैं भी उससे प्यार करने लगी थीं अब बस मैं यही चाहती थी कि राहुल मेरे पास आ जाये और मैं उससे अपनी दिल कि बात कह दूँ,मेरे पास उसका एक नंबर था मैंने उस पर कई बार कॉल लगाया लेकिन शायद वो नंबर बंद हो चूका था,मुझे बहुत घबराहट होने लगी थी मैं चाहती थी जल्द से जल्द उससे मिलूं,मुझे दिल्ली के एक कॉलेज में अपनी फिल्म के परमोशन का मौका मिला वहाँ हमारे टीम के कई लोग गए थे उस बीच मेरी मुलाक़ात दुबारा राहुल से हुई वो मुझसे ही मिलने आया था, जब मुझे ये पता चला तब मेरे अंदर थोड़ी जान में जान आयी,मुझे पहले लगता था कि शायद मैं उसे खो चुकी हूँ,प्रमोटिंग ख़त्म होने के बाद मैं उसके पास गई हम दोनों ने कुछ देर बाते भी की|राहुल थोड़ा बदला हुआ लग रहा था,हमें दिल्ली में दो दिन और रहना था,राहुल थोड़ा जल्दी में था उसने मुझे अपने होटल का कार्ड दिया और बोलने लगा “मैं कई दिनों तक दिल्ली में ही रहने वाला हूँ तुम कभी भी मुझसे मिलने आ सकती हो”,उस कार्ड के पीछे राहुल का नंबर भी लिखा हुआ था मेरे चेहरे पर अपने आप ही एक स्माइल आ गयी,मेरे अंदर एक उम्मीद जाग उठी,होटल जाकर मैंने राहुल को कॉल करने का सोचा,फिर एक पल के लिए लगा कि राहुल में तो अब काफी बदलाव आ चुका है जब मैं उसके सामने अपने प्यार का इज़हार कर दूंगी तभी बात करुँगी उससे,मैंने अगले ही दिन उससे मिलने का निर्णय लिया,मैंने उसके लिए बहुत ही प्यार से एक ग्रीटिंग कार्ड तैयार किया उसमें बहुत प्यारी एक शायरी भी लिखी हुई थी,मैंने उसके ऊपर एक रोज़ भी लगा दिया था ,अगले ही दिन मैं और मेरा ड्राइवर उसके पते पर पहुंच गए,मैं बहुत ज्यादा खुश थी क्यूंकि आज मैं उससे अपने प्यार का इज़हार करने वाली थी,हम दोनों उस होटल में पहुंच चुके थे मैंने ड्राइवर को गाड़ी में ही वेट करने के लिए बोल दिया था और फिर मैं उस होटल के अंदर गयी,मैंने रिसेप्शन पर राहुल का कार्ड दिखाया और मैं उनसे पूछने लगी कि वो किस कमरे में ठहरा हुआ है उन लोगो ने फिर मुझसे मेरी आइडेंटी प्रूफ मांगी,मैंने जब उन्हें आइडेंटी प्रूफ दिखाया तब उसमे से एक वेटर ने मुझे राहुल के कमरे तक छोड़ दिया, मैं अब उसके कमरे के बाहर खड़ी थी थोड़ा डर भी लग रहा था मैंने उसके कमरे का बेल भी नहीं बजाया सीधा दरवाज़े पर हाथ रख दिया,कमरे का दरवाज़ा खुला हुआ था मेरे हाथ रखते ही दरवाज़ा पूरा खुल गया फिर मुझे दोनों चौंक कर देखने लगे|

उस कमरे में राहुल था और उसकी गर्लफ्रेंड थी,मैंने अपना हाथ पीछे छुपा लिया,राहुल का हाथ उसकी गर्लफ्रेंड के हाथो में था दोनों आपस में बाते कर रहे थे,मैं ये देख कर कुछ देर के लिए बिलकुल सुन्न रह गयी थी,मैं मुस्कुराते हुए सिर्फ कुछ लाइन ही बोल पायी”आई ऍम सॉरी,शायद मैं गलत टाइम पर आ गयी” मैं वहाँ से जल्दी से भाग गयी और जाकर एक दीवार के पीछे चुप गयी,थोड़ी ही देर बाद राहुल मुझे ढूढ़ता हुआ बाहर आया,मैं अब भी उस दीवार के पीछे छुपी हुई थी और उसे देख रही थी,कुछ देर बाद राहुल अपने कमरे में अंदर चला गया,मैं वहाँ से निकल कर सीधा मेन डोर से बाहर चली गयी,होटल के आगे एक गार्डन था वहाँ बिलकुल सन्नाटा थी मैं गार्डन में जाकर एक बेंच पर बैठ गयी और फिर फूट-फूट कर रोने लगी,मेरे हाथो में अब भी वो ग्रीटिंग कार्ड था जिसका अब कोई वैल्यू नहीं रह गया था मैंने उसे फाड़ कर कर कूड़ेदान में डाल दिया,मुझे कुछ समझ ही नहीं आ रहा था कि मैं क्या करूँ,कुछ पल के लिए सोच रही थी कि इस दुनिया को छोड़ कर चली जाऊँ लेकिन मुझे मरने से भी डर लग रहा था अब मैं ना मर सकती थी ना जी सकती थी उसके बिना,लगभग आधे घंटे तक मैं खूब रोती रही फिर थोड़ी देर बाद मैंने राहुल और उसकी गर्लफ्रेंड कि आवाज़े सुनी,वह मेरी ओर बढ़ रही थी,मैंने फटाफट अपने आंसू पोंछे और हसने की कोशिश करने लगी,राहुल मेरे नज़दीक आया और मुझसे पूछने लगा की मैं कहाँ पर थी इतनी देर से,मैं हसते हुए उसके सारे सवालों का जवाब देने लगी,राहुल ने मुझे अपनी गर्लफ्रेंड से मिलवाया,उसकी गर्लफ्रेंड का नाम लीज़ा था,मैंने ये महसूस किया कि वो उसके साथ बहुत खुश था उसकी खुशी देख कर मैं भी खुश हो गयी,थोड़ी देर तक बाते करने के बाद वो दोनों अपने गाड़ी में बैठ कर चले गए और फिर मैं भी वहाँ से चली गयी|
जब मुझे उससे प्यार हुआ तब तक वो किसी और का हो चूका था,मैंने ये बात सिर्फ अपने तक ही रहने दी,शायद वो कभी जान भी नहीं पाया होगा कि मैं उससे कितना प्यार करती थी|

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हमारी आख़री कैंपिंग !

मुख्य पात्र

नैना

रौशनी

नेहा

रोहन

सुमित

अलीना

नए कैंपर्स – जुली,रॉनी

बात उस समय की है जब मैं,सुमित,नेहा,रोहन,रौशनी,अलीना सब कैम्पेन पर गए थे,हम सब बहुत अच्छे दोस्त थे और अलीना तो मेरे बचपन की फ्रेंड थी हम हमेशा साथ रहते थे।
इस बार हम सब बहुत खुश थे क्यूंकि हमें हिमाचल के दिल यानी पालमपुर ले जाया जा रहा था मेरे सभी दोस्तों का ये सपना था पालमपुर जाना,और आज फाइनली हमें मौका मिल ही गया,इस समय हमारी टीम राजस्थान के चित्तौड़गढ़ के एक होटल में थी,हमारा पिछला टास्क अच्छा नहीं गया था दरअसल हमारे कोच से गलती हो गयी थी उन्होंने गर्मी के समय में राजस्थान का चयन किया था,इस बार तो राजस्थान की गर्मी ने हद्द पार कर दी थी कुछ प्लेयर्स तो चलते-चलते बेहोश भी गए थे उन में से एक मैं भी थी इसलिए इस बार हमारे कोच ने हिमाचल को चुना, हम सब वहां से पालमपुर रवाना होने कि तैयारी कर रहे थे।कुछ देर बाद हमारी बस आयी और हम लोग होटल को छोड़ कर बस में बैठ गए,रास्ते में सभी लोग बहुत मस्ती करते हुए जा रहे थे,फिर थोड़ी देर बाद हमारे कोच आये और उन्होंने बताया कि पालमपुर में हमें दो नए दोस्त मिलने वाले है,हम लोग नए दोस्तों से मिलने के लिए बहुत उत्सुक्त थे,हमारे कोच बस में ही अपनी निति समझाने लगे थे,उन्होंने बताया हमें जो इलाका मिला है वहां लोगो का आवाजाही बिलकुल न के बराबर है लेकिन उसके आसपास के लोग बता रहे थे कि वहां एक अजीब सी शक्ति अपनी ओर खींचती है हलाकि ऐसा कुछ है नहीं क्यूंकि हमारे टीम के कुछ लोग इस पर काम कर रहे है और उन्हें अभी तक ऐसा कुछ भी महसुस नहीं हुआ है ,वो जगह हमारे लिए बिलकुल सेफ है इसलिए चिंता करने कि कोई बात नहीं है,तभी रोहन बोल पड़ा”सर अगर गांव वालो कि बात सच निकली तो,आई ऍम स्योर डेफ्फिनेटली मज़ा आने वाला है”

सभी रोहन को देखने लगे,फिर अलीना का सवाल आया”सर ये भी तो हो सकता है न गांव वाले अपना एक्सपीरियन्स शेयर कर रहे हो,आई मीन सच में ऐसी कोई ऐसी शक्ति हो”

उसके चुप होने के बाद ही सुमित बोल पड़ा”अरे ये तो बिलकुल डरपोक है,आज कल के ज़माने में भी ये बात सच हो सकती है क्या, और गांव वालो के बाद तुहि होगी जो इन सब बातो पर विश्वाश करती होगी”सभी लोग हसने लगे अब कोच क़े बोलने की बारी थी,साइलेन्स गायस अब सब मेरी बातो को ध्यान से सुनेंगे उस जगह पर ऐसा कुछ भी नहीं है अगर होता तो वहां की सरकार हमें उस जगह पर जाने कि इज़ाज़त नहीं देती,लेकिन अगर आप लोग मना करे तो हम ये निति रद्द कर सकते है,तो बोलो क्या कहते हो”

तभी नेहा बोल पड़ी,”सर आप भी किसकी बात सुन रहे हो,आज कल थोड़ी न ऐसा कुछ होता है हम सब जाने को तैयार है(सभी को देखते हुए )यार तुम लोग भी तो बोलो,फिर हम सब ने एक साथ बोला लेकिन अलीना चुपचाप हम सब को देख रही थी”हाँ सर हम सब जाएंगे”सभी की बाते सुनते हुए सर हमें वहां ले जाने को तैयार हो गए “ठीक है हम सब जाएंगे लेकिन अगर किसी को भी ज़रा सी कुछ भी भनक लगे तो एक दूसरे को बताएँगे ज़रूर और हाँ सब साथ ही रहेंगे”सर की नज़र अलीना पर पड़ी,उन्होंने अलीना को बुलाया और उसे समझाने लगे,सर से बात करने के बाद अलीना मेरे पास आकर बैठ गयी,मैंने उससे पूछा”अलीना क्या हुआ तुम्हे,तुम जाना तो चाहती हो न”अलीना थोड़ा सोचते हुए मुझे जवाब देती है”अरे नहीं यार दरअसल मैंने अपने गांव की कई सारी हॉरर स्टोरीज सुन रखी है,तो बस उसका ख्याल आ गया था”तुम इन सब बातो को मानती हो,यार अब कहा होते है भूत प्रेत अब तो ये सब सिर्फ कहानी/किताबो में ही पायी जाती है,हम दोनों ऐसे ही बाते करते जा रहे थे |

एक लम्बा सफर तय करने के बाद हमारी बस एक रिसोर्ट के सामने रुकी, कुछ ही मिनट में पूरी बस खाली हो गयी हम सब पालमपुर के भीड़-भाड़ इलाक़े में थे हमें वहां पर नाश्ता दिया गया और हमारे कोच फिर से हमें समझाने लगे, कुछ देर वहां रुकने के बाद हम लोग अपने मंज़िल के लिए रवाना हो गए,इतनी गर्मी के समय भी यहाँ ठण्ड थी,हम लोगो को गर्म कपडे पहनने पड़े थे हमारे आलावा दो नए लोग भी थे हम सब आपस में बाते करते हुए जा रहे थे ,लगभग शाम के चार बज गए थे हम सब चल-चल के थक चुके थे हमने थोड़ी देर बैठने का सोचा,उस समय तक तो मौसम ठीक ही था लेकिन जैसे-जैसे हमलोग आगे बढ़ रहे थे अचनाक से ठण्ड बढ़ते जा रही थी हम सभी बढ़ते ठण्ड को महसूस कर पा रहे थे ,हमलोग थोड़ा ही आगे बड़े थे कि,अलीना बोल पड़ी”गायस हमें ये नेचर इन्फॉर्म कर रही है,आई थिंक हमें और आगे नहीं जानी चाहिए”हम सभी रुक कर उसकी बाते सुनने लगे थे,मैंने उससे पूछा”क्या हुआ अलिना,तुम हमें क्या बताना चाहती हो”फिर मोहित बोल पड़ा”अरे यार हम लोग इस डरपोक कि बात क्यूँ सुन रहे है,चलो हमें अभी और आगे चलना है”

अलिना गुस्से से बोल पड़ी”मोहित तेरा दिमाग ख़राब हो गया है क्या,तुम लोगो को ये अचानक से बढ़ रही ठण्ड महसूस नहीं हो रही…”मैं उसके नज़दीक गयी और उसे समझाने लगी”अलिना,ये ठंड तो मैं भी महसूस कर रही हूँ बट हम ये नहीं भूल सकते है कि हमलोग अभी नेचर की गोद में है और यहां चारो तरफ इतनी हरयाली है कि ठंडी तो बढ़ेगी ही”

अलिना- “ऍम सॉरी मैं और आगे नहीं चल सकती”

अलिना गुस्से से वही बैठ गयी

जो नए कैंपर्स थे उन्होंने भी अलिना को समझाया -“अलिना,कोच ने हमें साथ रहने को कहा है,चाहे कोई भी प्रॉब्लम क्यूँ न हो,हमें रिसोर्ट से निकले तो चार घंटे ही हुए है,कोच अगर हम से पूछेंगे तो हम क्या जवाब देंगे,चाहे कोई प्रॉब्लम क्यूँ न आये हम सब को हर हालात में साथ रहना है,(अपना दाहिना हाथ आगे बढ़ाते हुए)गायस सब प्रॉमिस करो,हम सब साथ रहेंगे”सब ने अपना-अपना हाथ बढ़ाया,अलिना ने भी अपना हाथ बढ़ाया और फिर हम सब चलने लगे|

लगभग छह बजे तक हम लोग चलते रहे,हम सब लोगो ने एक जगह ढूंढा रात गुज़ारने के लिए क्यूंकि अँधेरा होता जा रहा था|

सामने पहाड़ के निचे से झरने निकल रहे थे हम लोगो ने उसी के आसपास ठहरने को सोचा क्यूंकि झरने का पानी मीठा होता है जिसे हम आसानी से पी भी सकते थे और हमें पानी लेने के लिए कहीं दूर भी नहीं जाना पड़ेगा,सामने जो पहाड़ थी उस पर बर्फ़ की मोटी परत जमी हुई थी,जिसकी वजह से ठण्ड बहुत अधिक लग रही थी,हम सब लोग आधे-आधे बट गए दरअसल हमलोगो ने ऐसा इसलिए किया ताकि आधे लोग टेंट बना सके और आधे लोग पास वाले जंगल से लकड़ियाँ ला सके मुझे लकड़ियां लाने का काम मिला था,मेरे साथ तीन और लोग थे,अलीना टेंट बनाने के लिए रुकी थी|

चांदनी रात होने की वजह से जंगल हमें बहुत आकर्षित कर रहा था,चाँद की मीठी-मीठी रौशनी चारों तरफ फ़ैली हुई थी,हम सब मस्ती करते हुए और गाना गाते हुए लकड़ियाँ उठा रहे थे,हम चारो की नज़र एक लटक रही सूखी डाल पर पड़ी,हम सब ने आपस में विचार किया कि अगर हम ये डाल तोड़ ले तो हमें ज़्यादा लकड़ी ढूढ़ने की ज़रूरत नहीं पड़ेगी इसलिए हम उस डाल को तोड़ने में लग गए,लगभग एक मिनट ही हुआ होगा एक तेज़ हवा का झोंका हम से हो कर गुज़री जिसमें एक लड़की की आवाज़ मिश्रित थी जो सुनने में बहुत दर्द भरी लग रही थी,हम एका एक चौंक गए,हम सब ने आपस में पूछा तो उस आवाज़ को हम सभी ने महसूस किया था,हमने हवा का झोंका समझ कर उस बात को भुला दिया,हमने उस सुखी हुई टहनी को पेड़ से अलग कर दिया था,अब हम सब उस टहनी को घसीटते हुए अपने कैम्प तक ल जा रहे थे,चलते समय फिर से वो हवा हमसे होकर गुज़री,हम लोगो ने अचानक से उस टहनी को छोड़ दिया,सभी के चेहरे पर पसीने थे एक दूसरे का चेहरा देखते हुए जुली ने कहा “हमें शायद यहां नहीं आनी चाहिए था”

मैंने कहा -“हम सब को एक साथ रहना है चलो जल्दी कैम्प पर चलते है”

हमने उस टहनी को वही छोड़ा और कैंप पर पहुंच गए ,इस बीच हमें दुबारा कोई आवाज़ सुनाई नहीं दिया,जब हम लोग वहा पहुंचे तो सब खड़े होकर हमें आते हुए देख रहे थे,हम लोग तो पहले से ही डरे हुए थे और उनके चेहरे देख कर हमें और भी डर लगने लगा था,हमने जब पूछा तो उनलोगो ने कहा कि हमारी चीखने की आवाज़ आ रही थी,हमलोग समझ गए थे कि यहां कुछ और देर रहना सही नहीं है,हमारा कैंप लगभग तैयार हो गया था,जो लोग मेरे साथ गए थे वो लोग अपना सामान लेकर आ गये,उनलोगो ने कहा”हमें यहां एक मिनट भी नहीं रुकना चाहिए ,गांव वाले सही कह रहे थे यहां कुछ तो अजीब है ,चलो सब चलते है”

अलीना – क्या हुआ है ?

रोहन – “तुम सब को हो क्या गया है,सब-कैसी कैसी बाते कर रहे है,तुम लोग ये बताओ चीख़ क्यूँ रहे थे”

मैंने एक धीमी आवाज़ में कहां “ये लोग सही कह रहे है,हमें यहां नहीं रुकनी चाहिए,चलो सब यहां से”

रोहन-“यार तुम भी ऐसी बात करने लगी,तुम लोगो को हो क्या गया है,कैसी बाते कर रहे है सब,बताओगे कुछ ”

“रोहन हम सब सही कह रहे है क्यूंकि हम में से किसी ने भी चीखने की आवाज़ नहीं निकाली थी,और हम ने भी जंगल में किसी के होने का महसूस किया था और एक बार नहीं बल्कि दो बार”

रौशनी – आई थिंक हमें कोच से बात करनी चाहिए,मैं उन्हें कॉल लगाती हूँ(कॉल लगाते हुए)यार यहां नेटवर्क भी नहीं आ रहा,मैं आगे जाकर देखती हूँ (मन में बड़बड़ाते हुए )नेटवर्क क्यूँ नहीं आ रहा”

जंगल की तरफ से फिर से चीखने की आवाज़ आती है,रौशनी रुक कर कहती है”ये आवाज़ किसने निकाली है अभी”

सभी वहा से पहाड़ी की तरफ भागने लगे,रौशनी भी दौड़ने लगी,कुछ लोगो के पास उनका सामान भी था लेकिन कुछ लोग बिना सामान के दौड़ रहे थे, हमलोग घंटो पहाड़ी पर चलते रहे लेकिन हमें रुकने के लिए ज़मीन नहीं मिली,चारो तरफ पहाड़ ही पहाड़ दिख रही थी,एका एक पहाड़ पर ज़ोर से हवा चलने लगी और पहाड़ पर जो बर्फ की परत थी वो भी पिघलने लगी,हमसब बहुत डर गए थे,वज़न कम करने के लिए कुछ लोगो ने अपना बैग उतार दिया और वहां से भागने लगे लगभग पांच मिनट बाद सब कुछ शांत हो गया,हमलोग बहुत थक गए थे,हम सब निचली पहाड़ी पर पहुंच गए और वही पर बैठ गए कुछ देर बाद हम सब को वही पर नींद आ गयी थी,सुबह की किरण के निकलने से पहले ही हमारी आँखे खुल गयी थी हमें आस पास एक भी घर नहीं दिख रहा था ,हम सब रात के हादसे से बहुत डरे हुए थे,रोहन कहने लगा-“अगर मैं यहां से जिन्दा बच गया तो दुबारा कभी कैंपिंग पर नहीं आऊंगा “

अलीना -“मैंने कहां था तब किसी ने मेरी बात नहीं सुनी अब भुगतो सब के सब,हम सब मारे जायेंगे (तभी अलीना अपने हाथ को ज़मीन पर टिकाती है)

ये क्या है(अलीना जहा बैठी हुई थी वहा पर बर्फ के अंदर से एक ऊँगली जैसा निकला हुआ था जब हमने बर्फ़ को हटा कर देखा तो सच में वह एक ऊँगली थी,हम लोग पहले से ही डरे हुए थे और अब ये ऊँगली देख कर हम सब और भी ज़्यादा डर गए,हम में से कुछ लोगो ने सोचा कि हमें पुलिस के को बतानी चाहिए लेकिन इस बात से सब लोग सहमत नहीं थे उन में से एक थी अलीना उसका कहना था कि ये सब कोई आत्मा कर रही थी और वो हम सब को मारना चाहती है,नेहा ने एक सवाल के उद्देश्य कहा – आत्मा?
अलीना – “हाँ आत्मा,तुम लोगो को क्या लग रहा है ये जो हम लोगो के साथ अभी तक हुआ है वो कोई आम हादसा है,नहीं ये सब उस आत्मा का काम है,आई ऍम स्योर ये ऊँगली भी उसी की है और हो न हो इस बर्फ के अंदर उसकी लाश भी होगी,मैं यहाँ से जा रही हूँ क्यूंकि मैं उसके हाथो मरना नहीं चाहती ”
अलीना इन सब मामलो में हमेशा नेगेटिव रहती थी,मैंने उसे फिर समझाया….
मैंने कहा- “लेकिन अलीना ये भी तो हो सकता है न कि वो ये चाहती हो कि हम उसकी मदद करे”

मोहित -“ऐसा नहीं हो सकता क्यूंकि हम यहां ख़ुद को बचाते हुए अपनी मर्ज़ी से पहुंचे है,अगर कोई है जो ये चाहता तो हमें कोई क्लु देता,मैं अलीना के बातो से सहमत हूँ,मैं भी जा रहा हूँ और आई थिंक हम सब को यहां से चलनी चाहिए”

रोहन – “अगर हम इस बात को पुलिस को नहीं बताये तो शायद ये राज बाहर नहीं आ पायेगा,हमें पुलिस के पास चलना चाहिए”

अलीना – जिसे जो करना है वो करो,मैं यह से जा रही हूँ(अलीना वहा से जाने लगती है उसके साथ मोहित और रौशनी भी जाते है,वो मुझे भी कहती है जाने को लेकिन मझे लगता था अगर हम इस सच्चाई से दूर भागे तो हम भी गुनहगार कहलायेंगे,मेरे साथ बाकी सब लोग रुके थे हम सब उन लोगो को जाते हुए देख रहे थे ,कुछ देर बाद वो हमारे आँख से ओझल हो गए, हमने बर्फ़ को हटाना शुरू कर दिया बर्फ के निचे एक लाश दबी हुई थी जो एक औरत की थी, हमने उस लाश को आधा ही निकाला था और देखते ही सभी के आँखो में आँसू आ गए थे हम लोग ही नहीं बल्कि जो भी उस लाश को देखता तो उसके आँखे भी नम हो जाये,कितने बुरे तरीके से इस बेचारी को किसी ने मारा था ज़रूर कोई हैवान ही रहा होगा जिसने आज फिर से मानवता को शर्मसार किया है|

उस औरत के पेट में एक छुरा घुपा हुआ था और गले में एक मोटी रस्सी बंधी हुई थी,खून के धब्बे बर्फ़ की वज़ह से जमे हुए थे और चेहरे पर काफ़ी चोट के निशाने भी थी,हमने उसके शरीर को एक पिले रंग की चुन्नी से ढक दिया जोकि नेहा की थी और एक छोर को उसके हाथो से बांध दिया ताकि वो चुन्नी उड़ ना सके और जब हम दुबारा आये तो आसानी से उसके पास पहुंच सके,

हम सब गांव के तलाश में निकल पड़े,बहुत देर तक चलने के बाद हमें एक घर मिला जहा एक औरत अपने दो बच्चे के साथ रहती थी,हम उनके घर के पास गए उसने हमको पानी के लिए पूछा और कहने लगी हम यहां के नहीं लग रहे थे |

हमने पानी पिने के बाद उससे पुलिस स्टेशन के बारे में पूछा,वो हम सब को वहा ले जाने के लिए तैयार हो गयी,हमें बस कुछ देर ही चलना था,पुलिस स्टेशन आते ही वो हमें अंदर जाने के लिए कहने लगी और वो वापस अपने घर चली गयी,हम सब अंदर गए और पूरी बात इंस्पेक्टर को बताने लगे,हमारी बात सुनने के बाद पुलिस इंस्पेक्टर हमें भी साथ चलने के लिए कहा,उससे पहले हमने अपने कोच से बात किया और उन्हें हमने पूरी घटना के बारे में बताया,हमारी टीम हमें पहले से ही ढूंढने में लगी थी क्यूंकि वो हम से कॉन्टैक्ट नहीं कर पा रहे थे |

पुलिस के साथ हम सब भी उस पहाड़ी के पास गए और चुन्नी के सहारे हम जल्द ही उस लाश तक पहुंच गए,पुलिस ने हमारी बहादुरी की तारीफ भी की और हमें सही सलामत हमारे कोच तक पहुंचाया,हम सब उसी दिन अपने-अपने घर लौट गए लेकिन हमारे जो दोस्त पहले ही आ गए थे वो अभी तक घर नहीं पहुंचे थे,पुलिस उनकी तलाश में अब तक जुटी हुई है |

उस लाश के बारे में पता लगाने पर पता चला कि उस औरत को उसके पति ने मारा था जोकि पागल था और शराब पीने का आदि भी था |

हमारी इस कैंपिंग ने हमें डराया भी और ज़िन्दगी की अहमियत को सिखाया भी,उस औरत की लाश को देख कर शायद उन पहाड़ो को भी उस पर तरस आ गया होगा इसलिए उसने उसे छुपा लिया था,इस घटना के बाद शायद हम लोग कैम्पिंग पर ना जा पाए लेकिन हम उस औरत के चेहरे को कभी भूल नहीं सकते !

क्या डरना ज़रूरी है?

क्या डरना ज़रूरी है ? मेरी इस कहानी की शुरुआत राजस्थान के भानगढ़ जिले से होती है,भानगढ़ का एक किला जो भूतो के वजह से बहुत फेमस है जहाँ छह बजे के बाद जाना मना है,राजस्थान सरकार यानि ‘एएसआई’ का एक बोर्ड भी लगा रखा है जिस पर लिखा है सूर्यास्त के बाद इस किले में प्रवेश करना मना है,बहुत से वैज्ञानिको ने इसके बारे में पता लगाने की कोशिश की थी,लेकिन अभी तक किसी ने ये दावा नहीं किया है की वहां सच में भूत रहते है लेकिन ऐसे कुछ लोगो के उदाहरण है जिन्होंने इसके खोज के अंत में एक रहस्मय तरीके से अपना जान गवा दिया है ,जैसे आज तक न्यूज़ चेंनल का एक रिपोर्टर गौरव तिवारी जिसकी मौत एक रहस्य बन कर रह गयी है,पुलिस भी आज तक पता नहीं लगा पायी है कि उसकी मौत की असल वजह क्या थी लेकिन पुलिस को शक है की गौरव तिवारी ने आत्महत्या किया था,इस बात के पीछे कितनी सच्चाई है ख़ैर ये तो कोई नहीं जनता है लेकिन उन्होंने अपने जीवन काल में ऐसे कई सारे सबूत इकठे किये है जो भूतो के होने का दावा करता हैं जिसे हम इंटरनेट के ज़रिये पढ़ और देख सकते है|

मेरी इस कहानी की शुरुआत तो भानगढ़ के भूतिया किले से ही होती है लेकिन इस कहानी का अंत कुछ और ही है ,आइये पढ़ते है|

एक ज़ोया नाम की लड़की थी,जिसने अपनी पूरी पढाई लन्दन के एक यूनिवर्सिटी से की थी| ज़ोया एक जर्नलिस्ट थी,ज़ोया के माँ-बाप बचपन में ही गुज़र चुके थे,वह अपने चाचा-चाची के साथ रहती थी,ज़ोया के माँ-बाप उसके लिए बहुत सारी प्रॉपर्टीज छोड़ कर गए थे जिस पर सिर्फ ज़ोया का ही हक़ था|
जोया ने अपनी पढ़ाई पूरी कर ली थी,उसके चाचा-चाची उसे इंडिया आने के लिए ज़िद करने लगे थे,लेकिन ज़ोया ने लंदन में ही सेटल्ड होने का सोचा था पर वह अपने चाचा-चाची की बातो को टाल नहीं सकी,ज़ोया इण्डिया वापस आ जाती है,ज़ोया का घर राजस्थान में था,ज़ोया बचपन से ही मॉडर्न कल्चर में रही थी उसके लिए राजस्थान में रहना मुश्किल हो चूका था लेकिन वहां रहने पर उसे कुछ ही दिनों में भानगढ के भूतिया किले के बारे में पता चला,हालांकि ज़ोया आज के ज़माने की लड़की थी,उसके लिए कही सुनी बातो पर विश्वाश करना नामुमकिन था,लेकिन उसने अपने गांव के कई लोगो के मुँह से उस किले के बारे में सुना था इसलिए अब उसका ध्यान भानगढ़ के हॉरर क़िले पर था |

उसने इंटरनेट के हर एक साइट्स पर से भानगढ़ किले के बारे में इन्फॉर्मेशन निकालना शुरू कर दिया,भूतो पर रिसर्च करना उसे बहुत ही रोचक लगा,उसके और भी फ्रेंड्स लन्दन से इंडिया आ गए उसका साथ देने के लिए,ज़ोया के चाचा-चाची इस सब के खिलाफ थे,उन्होंने ज़ोया और उसके फ्रेंड्स को बहुत समझाया लेकिन उनलोगो को उनकी बाते बकवास लगी क्यूंकि उनके लिए भूतों पर विश्वाश करना नामुमकिन था |
बात उस समय की है जब ज़ोया और उसके फ्रेंड्स भानगढ़ में पहुंचे थे |भानगढ़ में वो लोग शाम चार बजे तक पहुंच चुके थे और वो लोग उस किले से लगभग दस किलो मीटर की दूरी पर थे,उन लोगो की गाड़ी ख़राब हो चुकी थी और गांव वाले किले तक जाने को तैयार नहीं थे,फिर उनको वही पर एक होटल में रुकना पड़ा क्यूंकि मैकेनिक के आने में समय था,होटल के कुछ दूरी पर एक घर था जो अपने ज़माने में बहुत सुन्दर रहा होगा लेकिन इस समय वो घर एक खंडर बन चूका था,ज़ोया होटल के छत्त पर खड़ी होकर उस घर को बहुत ध्यान से देख रही थी,तभी होटल का वॉचमैन वहां पर आता है और ज़ोया के पूछने पर वह उस घर के रहस्मय कहानियाँ सुनाने लगता है|
वॉचमैन उसे बताता है की वो घर पहले इस इलाक़े के एक रईस आदमी का हुआ करता था,जो अपने ही घर में खो गया था,अब तक ये पता नहीं चल पाया है की वो ज़िंदा है या मरा हुआ क्यूंकि उसकी लाश किसी को नहीं मिली और ना ही कोई हिम्मत कर पाता है उस घर में जाने को क्यूंकि दरवाज़े के पास से ही अजीब-अजीब सी आवाज़े आती है,लोग आवाज़ से ही डर कर भाग जाते हैं ,ज़ोया ये सब सुनने के बाद अब वो भी उस आवाज़ को सुनना चाहती थी,वो अपने फ्रेन्डो को बिना बताये उस होटल से बाहर निकलती है,होटल से देखने पर वो घर तो नज़दीक लग रहा था लेकिन वास्तव में वो कुछ दूरी पर था,ज़ोया अकेले उन सड़को पर चली जा रही थी l

होटल के कुछ दूरी पर चार-पांच आवारा लड़के अपने बाइक पर बैठे हुए थे,ज़ोया को आते देख वो लड़के कमैंट्स पास करने लगते हैं,ज़ोया उन पर बिना ध्यान दिए आगे चले जा रही थी,सारे लड़के खड़े हो होकर ज़ोया का पीछा करने लगे,उन लड़कों को आते देख ज़ोया ने अपने कदमो को तेज़ कर लिया और वह वहाँ से भागने लगी उसके हाथो में एक कैमरा भी था,पांचो लड़के भी तेज़ चलने लगे और ज़ोया को पकड़ने की कोशिश करने लगे,ज़ोया से लगभग चार कदम पर वह घर था जिसमें वो जाने वाली थी,ज़ोया उस घर के अंदर चली जाती है,वो सभी लड़के उस घर के दरवाज़े के पास जाकर खड़े हो गए |

ज़ोया पीछे मुड़ कर देखती है,वो सभी लड़के बाहर खड़े होकर उसे देख रहे होते है,ज़ोया उस घर के और अंदर चली जाती है,थोड़ी ही देर में सारे लड़के उस घर के भीतर घुस जाते है,इस बार उस घर में से कोई आवाज़े नहीं आती है,ज़ोया उन लड़को को आते देख घर के मुख्य दरवाज़ा से अंदर चली जाती है घर के अंदर एक सीढ़ी होती है जिससे ऊपर के मंज़िलो पर पंहुचा जा सकता था,ज़ोया उन सीढ़ियों पर चढ़ कर दूसरे मंज़िल पर पहुँच जाती हैं,हर जगह सन्नाटा होता है,उसे उन लड़को के सीढ़ियों पर चढ़ने की आवाज़े आती है,ज़ोया सीढ़ी के बाये तरफ़ वाले कमरे के अंदर चली जाती है और दरवाज़ा बंद कर लेती हैं,थोड़ी ही देर में वो लड़के वहां पहुंच जाते है और हर एक कमरे में उसे ढूंढने लगते है,ज़ोया जिस कमरे के अंदर थी उसमे हल्की-हल्की रौशनी, रौशनदान से आ रही थी ,उस कमरे में कुछ सामाने बिखरी हुई थी जिस पर अब धूल मिट्टी और मकड़ियों का बसेरा था,दरवाज़ा के सामने एक बैड रखा हुआ था जिस पर सफ़ेद रंग की चादर बिछी हुई थी जो अब भी साफ़ दिख रहीं थी,बैड चारो तरफ से लाल रंग के धागे से बंधा हुआ था,लगभग दस मिनट में वह जग़ह बिलकुल सन्नाटे से घिर गया,बाहर से भी उन लड़को की आवाज़े नहीं आ रही थी|

ज़ोया ने अपना कैमरा निकाला और उस कमरे की विचित्र वस्तुओ का फोटो लेने लगी,फोटोज़ लेने के बाद उसे लगा अब शायद वो लड़के इस घर से जा चुके है इसलिए अब वो दरवाज़ा खोल सकती है लेकिन जब वो दरवाज़ा खोलने जाती है तो दरवाज़ा खुलता ही नहीं,उसने ने अपनी पूरी ताक़त लगा दी लेकिन दरवाज़ा नहीं खुला,ज़ोया बार-बार उस दरवाज़े को खोलने जाती लेकिन कोई फ़ायदा नहीं होता,उस कमरे में दो खिड़कियाँ थी लेकिन दोनों ही नहीं खुल रही थी,ज़ोया के लिए ये सब उसके सब्र का इम्तिहां था उसने हिम्मत नहीं हारी वो पूरी कोशिश करती रही उस कमरे से निकलने को लेकिन हर बार उसे सिर्फ निराशा ही मिलती,अब वह थक चुकी थी,वो सीधा जाकर बैड पर बैठ गयी उसके बैठते ही अचानक से वो बैड निचे ज़मीन पर चला गया ज़ोया के मुँह से एक ज़ोर की चीख निकल गयी,वह जिसे बैड समझ रही थी वास्तव में वहां पर कोई बैड था ही नहीं बल्कि वो तो हर जगह से काले जादू से घिरा हुआ बिना ऊपरी सतह के एक बड़ा सा संदूक था जिसके अंदर अब ज़ोया भी थी,ज़ोया जब उस संदूक में गिरती है तब उसके हाथों में खरोंच लग जाती है वो वहां से उठने की कोशिश करती है तभी उसे लगता है कि कोई पहले से ही उस संदूक के अंदर है लेकिन सफ़ेद कपड़े की वजह से वो उसका चेहरा नहीं देख पाती है,ज़ोया उस संदूक से बाहर निकल कर पहले उस सफ़ेद कपड़े को हटाती है जिसके वजह से वह संदूक के अंदर छिपे इंसान का चेहरा नहीं देख पायी थी,क्या उस कमरे में उसके आलावा कोई दूसरा इंसान था? फिर वो क्या था जिसे ज़ोया इंसान समझ रही थी,ज़ोया ने जब उसका चेहरा देखा तो उसे एक उम्मीद नज़र आयी वहाँ से निकलने की,लगभग तैंतीस साल का एक हट्टा-कट्ठा नौजवान जिसने रईसों वाले पोशाक़ पहन रखे थे वह आँखे बंद किये लेटा हुआ था,ज़ोया ने उसे उठाने का सोचा वो दुबारा उस संदूक के अंदर गयी उसके हाथो में वो सफ़ेद वाला चादर अभी भी था ज़ोया ने उस शख्स के हाथो को छुआ जो बर्फ के जितना ठंडा था,उसने एक ही झटके में अपना हाथ पीछे कर लिया उतने में ही उसने ने अपनी आँखे खोली जो बिलकुल लाल दिख रही थी उसने ज़ोया की तरफ देखा और फिर अपना मुँह आगे कर लिया और फिर उसने एक बहुत ज़ोर से चीख निकाली जिसके वजह से उस कमरे का सारा सामान हिल गया सारी खिड़किया अपने आप खुल-बंद हो रही थी ज़ोया ने अपना कान बंद कर रखा था,तभी उस कमरे का दरवाज़ा भी खुल गया,ज़ोया खुले दरवाजें को देख कर खुश हो गयी और खुश होते हुए उसे शुक्रिया कहने लगी,

(खुश होते हुए) ज़ोया – “थैंक यू बॉस तुम्हारी आवाज़ में सचमुच में बहुत दम है एक ही चीख़ में पुरे कमरे को हिला कर रख दिया,थैंक यू सो मच तुम्हारी वजह से ये दरवाज़ा भी खुल गया है ”

ज़ोया ने जैसे ही बाहर निकलने को सोचा वैसे ही दरवाज़ा फिर बंद हो गया,ज़ोया उस संदूक से निकल कर दरवाज़े और खिड़कियों को खोलने लगी लेकिन फिर से उसकी मेंहनत बेकार हो गयी,ज़ोया वापस उस संदूक के पास आती है और उस संदूक में बैठे शख्स को कहती है-

ज़ोया – तुम कैसे इंसान हो एक अकेली लड़की कब से दरवाज़ा खोलने में लगी है क्या तुम उसकी मदद नहीं कर सकते,बाय द वे तुम इस कमरे में क्या कर रहे हो?

तुम कुछ बोलते क्यूँ नहीं,मैं तुम से कुछ पूछ रही हूँ,(उसके चेहरे के सामने अपने हाथो को हिलाते हुए )हेलो क्या तुम मुझे सुन सकते हो?

(भयानक आवाज़ में)अजनबी-हमारा नाम विक्रम है और हम इंसान नहीं,

(विक्रम नाम का इंसान जो पचास साल पहले ही मर चुका है जिसकी आत्मा उस संदूक में कैद थी जो उस घर का मालिक भी था विक्रम की आत्मा को अब ज़ोया ने आज़ाद कर दिया था)

ज़ोया- ओ वॉव तुम बोल भी सकते हो…अच्छा नाम है,एक सेकंड तुमने क्या कहाँ अभी की तुम इंसान नहीं हो तो क्या भूत हो,देखो तुम मेरी मदद करो दरवाज़ा खोलने में मेरे दोस्त मेरा इंतज़ार कर रहे होंगे,प्लीज़

ज़ोया दुबारा दरवाज़े के पास जाने के लिए कुछ ही क़दम आगे बढाती है तभी वह उसका हाथ पकड़ लेता है|

ज़ोया – व्हाट आर यू डूइंग,हाथ छोड़ो मेरा(तभी विक्रम अपने मुँह से ज़ोर से हवा निकालता है जो आंधी जितनी तेज़ होती है उस कमरे के सारे शीशे अपने आप ही टूट जाते है,ज़ोया उसे बहुत ध्यान से देख रही थी) ये क्या था,लिसेन अगर तुम मुझे डरा रहे हो तो मैं बिलकुल भी नहीं डरी….,एक सेकंड अभी कुछ देर पहले तो तुम्हारे हाथ बहुत ठन्डे हो रहे थे और अब ये……,कौन हो तुम और इस घर में कर क्या रहे हो?
(संदूक में खड़े होते हुए) विक्रम – ये मेरा घर है और इस घर में एक बार जो कोई आ जाता है वो ज़िंदा वापस नहीं जाता है लेकिन तुम फिक्र मत करो हम तुम्हे नहीं मारेंगे क्यूंकि तुमने हमें आज़ाद करवाया है लेकिन अब तुम इस घर से नहीं जा सकती हो…………..|
(अपना हाथ छुड़वाते हुए ) ज़ोया – ओ हेलो,मुझे तुम्हारी एक भी बात सच नहीं लग रही है,मैं जाउंगी इस घर में से और अभी जा रही हूँ,लेकिन तुम्हे मेरी मदद करनी होगी दरवाज़ा खोलने में……|
(भयानक आवाज़ में ) विक्रम – एक बार जो कोई इस घर में आ गया वो ज़िंदा वापस नहीं जाता है ये बात तुम्हे समझ नहीं आयी क्या,मैं इंसान नहीं हूँ,मैं पचास साल पहले ही मर चूका हूँ लेकिन मैं मरना नहीं चाहता था वो तो मेरे रिश्तेदारों ने मेरी जायदात लेने के लिए मुझे मारकर मेरे ही घर में कैद कर दिया था ताकि मेरी आत्मा उन्हें नुक्सान न पंहुचा सके जिसे तुमने आज़ाद करवाया है इसलिए मैं तुझे नहीं मार रहा लेकिन अगर इस घर से जाने की कोशिश भी किया तो….
(हसते हुए ) ज़ोया -लिसेन अगर तुम मुझे डराने की कोशिश फिर से कर रहे हो तो मैं तुम्हे बता दूँ मैं किसी से नहीं डरती और मुझे तुम्हारी कहानी बिलकुल बकवास लग रही है ये बॉलीवूड के किसी मूवी का डायलॉग लग रहा है और रही बात इस घर से निकलने की वो तो मैं जाउंगी यहाँ से और वो भी अभी,समझ गए तुम|
ज़ोया दरवाज़े के पास जाती है और फिर से खोलने की कोशिश करती है लेकिन इस बार दरवाज़ा खुल जाता है ज़ोया पीछे मुड़ कर देखती है और उस कमरे से बाहर निकल जाती है ज़ोया के उस कमरे से निकलते ही विक्रम की आत्मा गायब हो जाती है उधर ज़ोया सीढ़ियों से उतर कर पहले मंज़िल पर पहुंच जाती है लेकिन वहां जो वो देखती है उसे देख कर वो सचमुच में डर जाती हैं और वापस उसी कमरे में जाती है जहा उसकी मुलाकात विक्रम की आत्मा से हुई थी |
ज़ोया अब विक्रम की आत्मा से मिलने के लिए बेताब हो रही थी वह उसे उस घर के हर एक कमरे में जाकर ढूंढ रही होती हैं अंत में वो छत्त पर जाती है उसे ढूंढने के लिए ,ज़ोया इधर-उधर देख ही रही होती है तभी विक्रम की आत्मा उसके पीछे आकर खड़ी हो जाती है जैसे ही ज़ोया पीछे मुड़ती है उसे देख कर चौक जाती है..,
ज़ोया – “विक्रम इस घर में ख़ून हुआ है,मैं जिस गुंडों से बच कर इस घर के अंदर आयी थी वो गुंडे मेरे पीछे-पीछे आये थे और उन सब को किसी ने मार दिया है और वो भी बुरी तरह से,चलो मैं तुम्हे दिखाती हूँ”
(भयानक आवाज़ में ) विक्रम की आत्मा- उन सब को मैंने मारा है क्यूंकि वो सब इस घर से जाने की कोशिश कर रहे थे जो भी इस घर से जाना चाहेगा मैं उसे मार दूंगा,
ज़ोया – मुझे तो तुम बहुत बड़े बेवक़ूफ़ लगते हो,किसी और के खून की सजा तुम अपने ऊपर क्यूँ ले रहे हो…..माना तुम थोड़े अजीब दिखते हो लेकिन इसका मतलब ये तो नहीं कि मैं………
(तभी विक्रम भयानक आवाज़ में ज़ोर से चिल्लाकर बोलता हैं) – तुम हमारी बातो पर विश्वाश क्यूँ नहीं करती हो,हम कोई मज़ाक नहीं कर रहे है,चलो मेरे साथ हम तुम्हे कुछ दिखाते हैं|
(दोनों एक ही झटके में एक स्टोर रूम में पहुंच जाते है जो बहुत ही गन्दा और सामानो से भरा हुआ था)
ज़ोया- मैं ये कहाँ आ गयी..?
विक्रम की आत्मा – इस कमरे में ऐसे बहुत से सबूत है जिसे तुम्हे देख कर हमारी बातो पर विश्वाश हो जायेगा,
ज़ोया – देखो मुझे कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता है कि तुम कौन हो और ज़िंदा हो या मरे हुए मुझे इस घर से जाना है बस,(तभी दरवाज़ा बंद हो जाता है,ज़ोया दौर कर दरवाज़े के पास जाती है और उसे खोलने की कोशिश करती है,जब वो पीछे मुड़ कर देखती है तो विक्रम की आत्मा वहां से गायब होती है,ज़ोया वापस उसी जगह पर आती है जहा पर विक्रम खड़ा था,ज़ोया उसे स्टोर रूम के हर एक कोने में ढूंढने लगती है उसे एक कोने में एक फोटो फ्रेम मिलती है जिसमे तीन लोग होते है माँ-बाप और एक बच्चा,ज़ोया दुबारा उस जगह पर सामान को हटा कर देखती ताकि कोई और फोटो मिले,उसे फिर से एक फोटो गैलरी मिलती है जिसमे बहुत सारी फोटोज होती है जिसे देखने के बाद उसे विश्वाश हो गया था कि ये घर विक्रम का ही है |

ज़ोया को एक न्यूज़ पेपर मिली जो अमेरिका की थी जिसमे विक्रम की फोटो छपी हुई थी और उसके बारे में लिखा हुआ था कि उसने फुटबॉल में नॉवल प्राइज जीता था वो अखबार 1949 की थी तभी ज़ोया के ऊपर खून की बूंदे गिरती है ज़ोया उन बूंदो को देख कर चौक जाती है और कुछ ही देर में खून की बूँदे गायब हो जाती है|
तभी दरवाज़ा धीरे से खुलता है,ज़ोया हैरान होकर दरवाज़े की तरफ देखती है और अखबार को वही फेंक कर दरवाज़े के पास जाती है ,स्टोर रूम भू तल में था,ज़ोया जैसे ही बाहर कदम रखती है उसे ज़ंज़ीर के बजने की आवाज़े आती है वो उस आवाज़ का पीछा करने लगती है ज़ोया जितना उस आवाज़ के करीब जाती वो आवाज़े उससे उतनी ही दूर चली जाती,ज़ोया को बाहर का रास्ता दिखता है लेकिन अब वो फिर से विक्रम की आत्मा से मिलना चाहती थी|

ज़ोया जिस ज़ंज़ीर की आवाज़ का पीछा कर रही थी दरअसल वो ज़ंज़ीर विक्रम के पैरों में लगा हुआ था,ज़ोया की अचानक नज़र चलते हुए विक्रम की आत्मा पर पड़ी ज़ोया उसे देखते ही दौर कर उसके पास गयी,
ज़ोया – विक्रम जी रुकिए,मैंने आप के बारे में पढ़ा है,आप अपने ज़माने में फुटबॉल के बहुत अच्छे प्लेयर थे ना,अगर आप ज़िंदा होते तो सेवेंटी प्लस में होते लेकिन मुझे जानना है आप की मौत कैसे हुई,मेरा मतलब है आप को किसने मारा और क्यूँ मारा?
विक्रम – तुम्हारे दोस्त तुम्हे छोड़ कर वापस लन्दन चले गए,
ज़ोया – क्या वो लोग चले गए,मुझे ढूंढा तक नहीं,कितने बुरे दोस्त थे अब मैं उनलोगो से कभी बात नहीं करुँगी,लेकिन हम लोग तो भानगढ़ किले में जाने वाले थे वो लोग वापस कैसे जा सकते है,
विक्रम -जब तुम इस घर में आयी थी तब तुम्हे गांव वाले ने आते हुए देखा था और जब तुम्हारे दोस्त तुम्हे ढूंढते हुए यहाँ आये थे तब उनलोगो ने इस घर की कहानी बताई वो सभी डर कर भाग गए |
(ज़ोर से हसते हुए ) ज़ोया – डरपोक फिरंगी,आप अपने बारे में बताईये?
विक्रम – मानना पड़ेगा तुम बहुत हिम्मत वाली हो तभी तो अभी तक एक मरे हुए इंसान के सामने खड़ी हो,मैं भी अपने उम्र में बिलकुल तुम्हारे जैसा था,बहुत हिम्मत वाला और बहादुर,उस दिन मेरे माँ-बाबूजी बहुत खुश थे क्यूंकि हम सब बॉम्बे से इस घर में प्रवेश करने वाले थे,मेरे बाबूजी ने बहुत प्यार से ये घर बनवाया था मेरी माँ और मेरे लिए,उस समय हमारे दिल्ली में भी कई जगह मकान थी और भारत के कई राज्य में भी बाबूजी ने प्रॉपर्टी लिया था हमारे घर में किसी चीज़ की कमी नहीं थी बाबूजी ने मेरे लिए राजस्थान की ही एक महारानी की बेटी से मेरा विवाह तय कर दिया था उस समय मैं इंग्लैंड में अपना अंतिम फुटबॉल मैच खेल रहा था बाबूजी का फ़ोन आया की उनके छोटा भाई गोवा से हमारे साथ हमारे घर में रहने आ रहे है और मेरे विवाह तक वही ठहरेंगे,मैं ये सुन कर चौक गया क्यूंकि दादाजी के मरने के बाद वो हम सब से अलग हो गए थे और आज अचानक इतने दिनों बाद आये थे तो शक तो होगा ही उसके अगले दिन ही मैं भारत लौट आया क्यूंकि मुझे पता लगा मेरे बाबूजी की तबियत ख़राब हो गयी है ,और जब मैं घर में वापस आया तो मुझे मेरे माँ-बाबू जी की लाश मिली,मैं ये देख कर टूट चुका था लेकिन मैंने देखा मेरे माँ-बाबू जी के पास मेरे चाचा,चाची बैठ कर आंसू बहा रहे थे,मेरा पहला शक उन पर ही गया,मैं उन लोगो से बहस करने लगा और उन्हें घर से निकल जाने का न्योता दे दिया,उनलोगो ने मुझसे एक दिन का समय माँगा मैं मना नहीं कर पाया क्यूंकि उस समय शाम हो रही थी अगले ही सुबह वो सब हमारे घर को छोड़ कर जाने वाले थे,उस रात मैं अपने माँ-बाबू जी के जाने के सदमें में सो ही नहीं पाया,मैं बाबू जी के सभाकक्ष में बैठा रो ही रहा था ही कि मेरे चाचा ने मेरे सिर पर लोहे की रॉड से मारी,मैं खड़ा होकर जैसे पीछे मुड़ा उन्होंने फिर से मेरे सर पर ज़ोर से मारा मैं वही पर बेहोश हो गया था,उसके बाद जो हुआ वो बहुत दर्दनाक था उस समय सारे नौकर अपने-अपने कमरे में सो रहे थे और सभाकक्ष में हम तीन के आलावा एक पंडित भी था जिसने मेरी आत्मा को कैद करने में उनकी मदद की थी,मेरे माँ-बाबू जी की आत्मा को भी उन लोगो ने कैद कर दिया है ताकि हमारी आत्मा उनको तंग ना करे उसके बाद मेरे बाबू जी की जितनी भी दौलत थी उनलोगो ने अपने नाम पर करवा लिया,क्या तुम हमारी मदद करोगी हमारे माँ-बाबू जी की आत्मा को आज़ाद करवाने में…,
(आंसू पोछते हुए) ज़ोया – जी विक्रम जी मैं ज़रूर करुँगी,लेकिन मुझे एक बात समझ नहीं आयी कि उस ज़माने में भी लोग पैसो के लिए भाई,भाई का खून कर देते थे ये तो इस ज़माने में होता है लोगो के लिए पैसे इतने इम्पोर्टेन्ट हो चुके हैं कि इसको पाने के लिए कुछ भी कर सकते है लेकिन वो लोग ये क्यूँ नहीं समझते कि ये बस दुनिया तक ही सिमित है मरने के बाद ये पैसे किसी के काम नहीं आने वाले और अगर ये अपने बच्चो के लिए ऐसा करते है तो इसकी क्या गारेंटी की वो बच्चे उनके बुढ़ापे का सहारा बनेंगे,क्या पता बच्चा भी किसी ऐसे ही लोगो के संगत में पड़ कर वो भी अपने माँ-बाप के साथ ऐसा ही करे|
मेरे माँ-बाप तो मुझे बचपन में ही छोड़ कर चले गए है लेकिन आज मुझे उनकी बहुत याद आ रही है (ज़ोया घुटनों के बल बैठ कर फूट -फूट कर रोने लगती है)
ज़ोया विक्रम के माँ-बाप की आत्मा को आज़ाद करवाने में मदद करती है उसके बाद ज़ोया के लिए हर तरफ से दरवाज़े खुल जाते है बाहर निकलने के लिए,ज़ोया विक्रम को उसके माँ-बाप के साथ देख कर बहुत खुश होती है,ज़ोया उस घर में से निकल कर वापस अपने घर लौट जाती है |